रामलाल पंचोला
Maa Jagdi ki Doli
Sila soud mela
Thursday, 20 March 2014
राजकीय इण्टर कालेज मथकुड़ी सैण
मेरा गौं कु स्कूल जख बिटी पड़ि लिखी मेरा भाई बन्धु आज देश - विदेश मा अपार तरक्की करिक अपड़ु अर गढभूमी कु नाम ऊंचु छन करणका ।
Wednesday, 19 March 2014
बौड़ी आवा
Garhwali kavita
बौडी औ दग्डया हुवै गै बतेरी जगावाला थामे नि थमैदो मन को उमाल
घास अर लाख्डू कान्डो का बोण दिन डसदू सुर्म्यालो
घाम रात डस्दी जोनमाया बण्गे तेरी जी को जन्जाल –
बौडी औ——सौन्ज्ड्यो दगड जब जान्दी दग्ड्याणी,
चैत्वाली बयार डाण्ड्यो जब रन्दी बयाणीतिसू
तिसू तिसि चोली जब कखी भट्याणीदिल मा
उठ्दी हूक मेरा कानू बज्दी धूयाल
बोडी औ—–नथुली बुलाक झ्यूरी मेरी कन करोदा ...
बौडी औ दग्डया हुवै गै बतेरी जगावाला थामे नि थमैदो मन को उमाल
घास अर लाख्डू कान्डो का बोण दिन डसदू सुर्म्यालो
घाम रात डस्दी जोनमाया बण्गे तेरी जी को जन्जाल –
बौडी औ——सौन्ज्ड्यो दगड जब जान्दी दग्ड्याणी,
चैत्वाली बयार डाण्ड्यो जब रन्दी बयाणीतिसू
तिसू तिसि चोली जब कखी भट्याणीदिल मा
उठ्दी हूक मेरा कानू बज्दी धूयाल
बोडी औ—–नथुली बुलाक झ्यूरी मेरी कन करोदा ...
Friday, 16 November 2012
थकान
थकान कथान
थकान कथान
चौबिस घंटा, बार महीना, जीवन में जीना दर जीना
पढ़े पहाड़े, रट कर झाड़े
बड़ी किताबों पर सर फाड़े
लड़के मौसम, दिन जगराते
कहाँ पता, कब आते जाते
खेल कूद कम, मन भुस मारे, पिच्चर थेटर ढांक बुहारे
खर्चे पर्चों में कल सारे, मेरु दंड कर भर कस सीना
[जीवन में जीना दर जीना]
कूप जगत से नीचे नीचे
बूड़े पहिरे ,बूझे पीछे
धूप नसेनी पकड़, गगन मुख
किस छत धाए मन, तन रुक रुक
फेर घटा कर सौ से एक कम, कम लगता जो मिलता हरदम
काक दृष्टि को चोटी परचम, खदबद मानुस, धार पसीना
[जीवन में जीना दर जीना]
कब उबरे कब, उठकर जागे
मृग माया छुट, सरपट भागे
बस कर कहकर, छोड़ छाड़ कर
जंगल चाहत, आर पार कर
रेत भरी मुट्ठी बह जाए, समय अजब झांकी कह जाए
भरे भंवर में रह सह जाए, बचता खोता ख़ाक सफ़ीना
[जीवन में जीना दर जीना]
पढ़े पहाड़े, रट कर झाड़े
बड़ी किताबों पर सर फाड़े
लड़के मौसम, दिन जगराते
कहाँ पता, कब आते जाते
खेल कूद कम, मन भुस मारे, पिच्चर थेटर ढांक बुहारे
खर्चे पर्चों में कल सारे, मेरु दंड कर भर कस सीना
[जीवन में जीना दर जीना]
कूप जगत से नीचे नीचे
बूड़े पहिरे ,बूझे पीछे
धूप नसेनी पकड़, गगन मुख
किस छत धाए मन, तन रुक रुक
फेर घटा कर सौ से एक कम, कम लगता जो मिलता हरदम
काक दृष्टि को चोटी परचम, खदबद मानुस, धार पसीना
[जीवन में जीना दर जीना]
कब उबरे कब, उठकर जागे
मृग माया छुट, सरपट भागे
बस कर कहकर, छोड़ छाड़ कर
जंगल चाहत, आर पार कर
रेत भरी मुट्ठी बह जाए, समय अजब झांकी कह जाए
भरे भंवर में रह सह जाए, बचता खोता ख़ाक सफ़ीना
[जीवन में जीना दर जीना]
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